• कुछ लोग इस बात को समझकर क्रोध पर नियंत्रण रख पाते हैं, पर अधिकतर लोग ,छोटे-छोटे कारणों से भी उबल पड़ते हैं।

    मैं खुद को हमेशा एक शांत स्वभाव की इंसान मानती रही हूँ।

    लेकिन हाल ही में मैंने खुद में एक बदलाव महसूस किया

    बिना किसी बड़ी वजह के, छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ने लगी थी।

    मेरी रोज़ सुबह की दिनचर्या में 6 से 7 के बीच पूजा शामिल है।

    8 बजे तक जब मैं कमरे में लौटती हूँ, तो सफ़ाई हो चुकी होती है।

    लेकिन पिछले कुछ समय से मेरी नज़र हर बार किसी कमी पर ही जाती थी

    कभी कोना ढंग से साफ़ नहीं, कभी कुछ रखा रह गया, और फिर मैं चिड़चिड़ा जाती थी।

    एक दिन मेरी बेटी ने सीधा सवाल कर दिया —

    “आप कैसी पूजा करती हैं ? पूजा के बाद इतना ग़ुस्सा…?”

    उसने बहुत सादे शब्दों में कहा —

    “अगर कुछ पसंद नहीं तो शांति से कहिए, या फिर ख़ुद कर लीजिए।

    सोचिए, किसी ने आपके हिस्से का काम कम कर दिया ,उसके लिए धन्यवाद बोलने की बजाय आप उसे डाँट रही हैं।”

    उसकी बात उस पल मुझे थोड़ी कड़वी लगी,

    लेकिन मेरी एक आदत है

    गलती बताने वाला कोई भी हो, मैं सोचती जरूर हूँ।

    मैंने भीतर झाँकना शुरू किया और पाया कि पूजा से पहले

    मुझे खुद के भीतर सफ़ाई की ज़रूरत है।

    मेरा दृष्टिकोण धीरे-धीरे नकारात्मकता की ओर जा रहा था।

    मैं अच्छी चीज़ों को देख ही नहीं पा रही थी।

    यह मेरी स्वाभाविक प्रकृति नहीं थी ,और यही बात मुझे अंदर तक झकझोर गई।

    मैंने देखा कि जो काम पूरा हुआ था, उसमें मैं सिर्फ़ “कमियाँ” ढूंढ़ रही थी।

    मेरी बेटी ने “पूरा हुआ” देखा,

    मैंने “पूरी तरह से सही नहीं हुआ” देखा।

    मेरे ग़ुस्से की जड़ शायद अहंकार थी

    यह मान लेना कि सिर्फ़ मैं ही सही कर सकती हूँ, बाकी सब अधूरे हैं।

    पर काम करने वाला इंसान मशीन नहीं होता।

    वो भी थकता है, ऊबता है, और कभी-कभी वह भी कम उत्साहित होता है।

    जब हम किसी की मेहनत को नजरअंदाज़ करते हैं,

    या सिर्फ़ उसकी गलतियाँ गिनाते हैं

    तो हम केवल उसके मनोबल को नहीं तोड़ते,

    बल्कि अपने आसपास की ऊर्जा को भी दूषित कर देते हैं।

    थोड़े से प्रशंसा के शब्द,

    थोड़ा धैर्य, और

    थोड़ी शांति

    किसी का दिन बदल सकते हैं

    और हमारा भी।

    🧠 अब इसे थोड़ा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझते हैं:

    जब हमें बार-बार ग़ुस्सा आता है, तो शरीर में ग्लूकोज का स्तर ऊपर-नीचे होता है, जिससे लीवर पर दबाव पड़ता है और कई बीमारियों का खतरा बढ़ता है। वहीं जब हम शांत और सकारात्मक सोच रखते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में एंडोर्फिन नामक हार्मोन निकलता है, जो: मूड सुधारता है तनाव कम करता है और हमें आंतरिक रूप से मज़बूत बनाता है

    हमारा शरीर ही हमारी भावनाओं का घर है।

    ख़ुशी, उत्साह और संतुलन का रसायन भी यहीं बनता है

    और उदासी, चिड़चिड़ापन और निराशा का भी।

    🌸 अंत में बस यही सीखा:

    ख़ुशियाँ कहीं बाहर नहीं होतीं ,

    हमारे भीतर होती हैं।

    हमें बस उन्हें पहचानना और संजोना होता है।

    जब हम खुद को सुधारते हैं,

    तो हमारे आसपास की दुनिया भी बेहतर हो जाती है।

    खुश रहिए… और अपने आसपास के लोगों को भी थोड़ा सा सुकून दीजिए।

    वही असली पूजा है। 🙏😊

    🌿 धैर्य कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताक़त है।

    🌊 क्रोध में बह जाना आसान है, पर ठहर जाना आत्मबल है।

    इस आत्मचिंतन ने मुझे फिर से अपने दृष्टिकोण को सुधारने का अवसर दिया।

  • स्वागत है… मेरे शब्दों की दुनिया में!

    यहाँ कोई तय राह नहीं, कोई विषय-सीमा नहीं।

    बस मन के भीतर जो भी हलचलें उठती हैं उन्हें पंक्तियों में ढाल देती हूँ।

    कभी प्रकृति की बात होती है, कभी शिक्षा पर सोच।

    कभी प्रेरक विचार उभरते हैं, और कभी जीवन के अनुभव खुद-ब-खुद कलम पकड़ लेते हैं।

    शब्दों के इस सफर में अगर आपका मन कहीं ठहर जाए ,तो यही मेरा सच्चा संतोष है।

  • कभी मन की बात किताबों में दर्ज हो जाती थी, कभी डायरी के पन्नों में।

    अब उन्हें साँझा करने का मन है क्योंकि शायद किसी और की सोच से वो टकरा जाए और एक नई ऊर्जा पैदा हो।

    मैं लिखती हूँ क्योंकि:

    • शब्द साक्षी बनते हैं अनुभवों के

    • विचारों को उड़ान मिलती है

    • और शायद कोई एक पंक्ति, किसी और का दिन बेहतर बना दे

    यह ब्लॉग सिर्फ लेखन नहीं, मन की मिट्टी में बीज बोने जैसा है।

    🌿📚✨

    – सीमा द्विवेदी

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